Link: https://www.youtube.com/watch?v=sPlSH6n37ts
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The music is all around us, all you have to do.. is listen
Must listen:
https://www.youtube.com/watch?v=cNgVH52EnXQ
काग़ज़ के दो पंख लेके उड़ा चला जाए रे
जहाँ नहीं जाना था, ये वहीं चला, हाय रे
उमर का ये ताना-बाना समझ ना पाए रे
ज़ुबाँ पे जो मोह-माया, नमक लगाए रे
के देखे ना, भाले ना, जाने ना, दाए रे
फ़तह करे किलें सारे, भेद जाए दीवारें
प्रेम कोई सेंध लागे
अगर-मगर, बारी-बारी, जिया को यूँ उछाले
जिया नहीं गेंद लागे
माटी को ये चंदन सा माथे पे सजाए रे
ज़ुबाँ पे जो मोह-माया, नमक लगाए रे
के देखे ना, भाले ना, जाने ना, दाए रे
- From movie Lootera (https://www.youtube.com/watch?v=DeJp-Rn__9M)
आदतन… अपना भविष्य मैं अपने हाथों की
रेखाओं में टटोलता हूँ……
'कहीं कुछ छुपा हुआ ह' – सा चमत्कार
एक छोटे बादल जैसा हमेशा साथ चलता है।
तेज धूप में इस बादल से हमें कोई सहायता नहीं मिलती…
वो हथेली में एक तिल की तरह… बस पडा रहता है।
तिल का होना शुभ है…
और इससे लाभ होगा…
इसलिये इस छोटे बादल को संभालकर रखता हूँ।
फ़िर इच्छा होती है…… कि वहाँ चला जाऊँ……
जहाँ बारिश पैदा होती है…
बादल बँट रहे होते हैं……
पर शायद देर हो चुकी है।
अब मेरी आस्था का अँगूठा इतना कडक हो चुका है
कि वो किसी के विश्वास में झुकता ही नहीं है।
फ़िर मैं उन रेखाओं के बारे में सोचता हूँ……
जो बीच में ही कहीं गायब हो गयीं थीं……
'ये एक दिन मेरी नियति जीयेगा' – की आशा में……
जो बहुत समय तक मेरी हथेली में पडी रहीं……
क्या थी उनकी नियति?
कौन सी दुनिया इंतजार कर रही थी……
इन दरवाजों के उस तरफ़……
जिन्हें मैं कभी खोल नहीं पाया……।
तभी मैंने एक अजीब सी चीज देखी……
मैंने देखा… मेरे माथे पर कुछ रेखायें बढ गई हैं…… अचानक।
अब – ये रेखायें क्या हैं।
क्या इनकी भी कोई नियति है…? अपने दरवाजे हैं?
नहीं – इनका कुछ नहीं है।
बहुत बाद में पता चला इनका कुछ भी नहीं है।
ये मौन की रेखाये हैं।
मौन – उन रेखाओं का जो मेरे हाथों में उभरी थीं।
पर मैं उनके दरवाजे कभी खोल ही नहीं पाया।
सच मैंने देखा है-
जब भी कोई रेखा मेरे हाथों से गायब हुई है…
मैंने उसका मौन अपने माथे पर महसूस किया है।
मुझे लगता है- यही मौन है – जो हमें बूढा बनाते हैं।
जिस दिन माथे पर जगह खत्म हो जायेगी……
ये मौन चेहरे पर उतर आयेगा………
और हम बूढे हो जायेंगें।
- Manav Kaul
https://youtu.be/XyO__sHlj18?si=0y9p_oRy0gajvIjp&t=196
तो पहले अपना नाम बता दूँ तुमको,
फिर चुपके चुपके धाम बता दूँ तुमको
तुम चौंक नहीं पड़ना, यदि धीमे धीमे
मैं अपना कोई काम बता दूँ तुमको।
कुछ लोग भ्रान्तिवश मुझे शान्ति कहते हैं,
कुछ निस्तब्ध बताते हैं, कुछ चुप रहते हैं
मैं शांत नहीं निस्तब्ध नहीं, फिर क्या हूँ
मैं मौन नहीं हूँ, मुझमें स्वर बहते हैं।
कभी कभी कुछ मुझमें चल जाता है,
कभी कभी कुछ मुझमें जल जाता है
जो चलता है, वह शायद है मेंढक हो,
वह जुगनू है, जो तुमको छल जाता है।
मैं सन्नाटा हूँ, फिर भी बोल रहा हूँ,
मैं शान्त बहुत हूँ, फिर भी डोल रहा हूँ
ये सर सर ये खड़ खड़ सब मेरी है
है यह रहस्य मैं इसको खोल रहा हूँ।
मैं सूने में रहता हूँ, ऐसा सूना,
जहाँ घास उगा रहता है ऊना-ऊना
और झाड़ कुछ इमली के, पीपल के
अंधकार जिनसे होता है दूना।
तुम देख रहे हो मुझको, जहाँ खड़ा हूँ,
तुम देख रहे हो मुझको, जहाँ पड़ा हूँ
मैं ऐसे ही खंडहर चुनता फिरता हूँ
मैं ऐसी ही जगहों में पला, बढ़ा हूँ।
हाँ, यहाँ किले की दीवारों के ऊपर,
नीचे तलघर में या समतल पर या भू पर
कुछ जन श्रुतियों का पहरा यहाँ लगा है,
जो मुझे भयानक कर देती है छू कर।
तुम डरो नहीं, वैसे डर कहाँ नहीं है,
पर खास बात डर की कुछ यहाँ नहीं है
बस एक बात है, वह केवल ऐसी है,
कुछ लोग यहाँ थे, अब वे यहाँ नहीं हैं।
यहाँ बहुत दिन हुए एक थी रानी,
इतिहास बताता नहीं उसकी कहानी
वह किसी एक पागल पर जान दिये थी,
थी उसकी केवल एक यही नादानी!
यह घाट नदी का, अब जो टूट गया है,
यह घाट नदी का, अब जो फूट गया है
वह यहाँ बैठकर रोज रोज गाता था,
अब यहाँ बैठना उसका छूट गया है।
शाम हुए रानी खिड़की पर आती,
थी पागल के गीतों को वह दुहराती
तब पागल आता और बजाता बंसी,
रानी उसकी बंसी पर छुप कर गाती।
किसी एक दिन राजा ने यह देखा,
खिंच गयी हृदय पर उसके दुख की रेखा
यह भरा क्रोध में आया और रानी से,
उसने माँगा इन सब साँझों का लेखा-जोखा।
रानी बोली पागल को जरा बुला दो,
मैं पागल हूँ, राजा, तुम मुझे भुला दो
मैं बहुत दिनों से जाग रही हूँ राजा,
बंसी बजवा कर मुझको जरा सुला दो।
वो राजा था हाँ, कोई खेल नहीं था,
ऐसे जवाब से उसका कोई मेल नहीं था
रानी ऐसे बोली थी, जैसे इस
बड़े किले में कोई जेल नहीं था।
तुम जहाँ खड़े हो, यहीं कभी सूली थी,
रानी की कोमल देह यहीं झूली थी
हाँ, पागल की भी यहीं, रानी की भी यहीं,
राजा हँस कर बोला, रानी तू भूली थी।
किन्तु नहीं फिर राजा ने सुख जाना,
हर जगह गूँजता था पागल का गाना
बीच बीच में, राजा तुम भूले थे,
रानी का हँसकर सुन पड़ता था ताना।
तब और बरस बीते, राजा भी बीते,
रह गये किले के कमरे रीते रीते
तब मैं आया, कुछ मेरे साथी आये,
अब हम सब मिलकर करते हैं मनचीते।
पर कभी कभी जब वो पागल आ जाता है,
लाता है रानी को, या गा जाता है
तब मेरे उल्लू, साँप और गिरगिट पर
एक अनजान सकता-सा छा जाता है।
- Bhawani Prasad Mishr
https://www.youtube.com/watch?v=mfUahN3rzcw
जीने की आदत पड़ गयी है
जीवन को जीने की ऐसी आदत में
बरसात के दिन हैं यदि
तो जीने की आदत में
बरसात हो रही होती है
छाता भूल गया तो
जीवन जीने की आदत में
छाता भूल जाता हूँ
और भींग जाता हूँ
जब बिजली कौंध जाती है
तब बिजली कौंध जाती है
आदतन जीना, उठना, बैठना, काम करना
थोड़े थोड़े भविष्य से ढेर सारे अतीत इकट्ठा करना
बचा हुवा तब भी ढेर सारा भविष्य होता है
ऐसे में ईश्वर है की नहीं की शंका में कहता हूँ
मुझे अच्छा मनुष्य बना दो
और सबको सुखी कर दो
तदानुसार अपनी कोशिश में पता नहीं कहाँ से
आदत से अधिक दुःख की बाढ़ आती है
जैसे पड़ोस में ही दुःख का बांध टूटा हो
और सुख का जो एक तिनका नहीं डूबता
दुःख से भरे चेहरे के भाव में
मुस्कुराहट सा तैर जाता है
न मुझे डूबने देता है, न पड़ोस को
और जब बिजली कौंध जाती है
तब बिजली कौंध जाती है
अंधेरे में बिजली कौंध जाने के उजाले में
सम्हलकर एक कदम आगे रख देता हूँ
जीवन जीने की ऐसी आदत में
जब मैं मर जाऊँगा
तो कोई कहेगा शायद मैं मरा नहीं
तब भी मैं मरा रहूँगा
बरसात हो रही होगी
तो जीवन जीने की आदत में
बरसात हो रही होगी
और मैं मरने के बाद
जीवन जीने की आदत में
अपना छाता भूल जाऊँगा
Poem by Vinod Kumar Shukl
https://www.youtube.com/watch?v=mbcjBh25sKA
“चाँदनी की पाँच परतें,
हर परत अज्ञात है ।
एक जल में,
एक थल में,
एक नीलाकाश में ।
एक आँखों में तुम्हारे झिलमिलाती,
एक मेरे बन रहे विश्वास में ।
क्या कहूँ , कैसे कहूँ.....
कितनी जरा सी बात है ।
चाँदनी की पाँच परतें, हर परत अज्ञात है ।
एक जो मैं आज हूँ ,
एक जो मैं हो न पाया,
एक जो मैं हो न पाऊँगा कभी भी,
एक जो होने नहीं दोगी मुझे तुम,
एक जिसकी है हमारे बीच यह अभिशप्त छाया ।
क्यों सहूँ ,कब तक सहूँ....
कितना कठिन आघात है ।
चाँदनी की पाँच परतें, हर परत अज्ञात है ।”
- Sarveswar Dayal Saxena
https://www.youtube.com/watch?v=nyWWD7laFP4&t=9s
LYRICS:
Chorus
Chor dey bindiya
Bhanwar hee bohat hain
Verse 1
Sajna sanwarna
Jaltay hain tujhse
Kajal ka bhi mun bana hai
Jhumkoon ki teri
Zulfoon se na banni
Verse 2
Palkain jo chapkain
Chooray badal paani
Aansu banay khushnaseeb jinki
Gaaloon se tere rawaani
Sonay ko tere tarsay hai nindiyaa
Link - https://www.youtube.com/watch?v=AGCuRnIa7QA&list=RDAGCuRnIa7QA&index=1
Automatically mind calms down with the soulful music but your body sways. I am not an expert on defining music but the way tempo and pitch changes in song. And instruments compliments it so well.
Lyrics celebrates the natural beauty of women. Many songs are there with same concept.. but something different is always welcome.
Songs and Poetry for the soul !!
I will add the songs which has touched me and gave me peace in this chaos.
Also, some dreams which have found their way back in my life listening to these melodies
Hope the people who come across this also will like it.