Wednesday, October 23, 2024

Ilham

 आदतन… अपना भविष्य मैं अपने हाथों की


रेखाओं में टटोलता हूँ……

'कहीं कुछ छुपा हुआ ह' – सा चमत्कार

एक छोटे बादल जैसा हमेशा साथ चलता है।

तेज धूप में इस बादल से हमें कोई सहायता नहीं मिलती…

वो हथेली में एक तिल की तरह… बस पडा रहता है।

तिल का होना शुभ है…

और इससे लाभ होगा…

इसलिये इस छोटे बादल को संभालकर रखता हूँ।

फ़िर इच्छा होती है…… कि वहाँ चला जाऊँ……

जहाँ बारिश पैदा होती है…

बादल बँट रहे होते हैं……

पर शायद देर हो चुकी है।

अब मेरी आस्था का अँगूठा इतना कडक हो चुका है

कि वो किसी के विश्वास में झुकता ही नहीं है।

फ़िर मैं उन रेखाओं के बारे में सोचता हूँ……

जो बीच में ही कहीं गायब हो गयीं थीं……

'ये एक दिन मेरी नियति जीयेगा' – की आशा में……

जो बहुत समय तक मेरी हथेली में पडी रहीं……

क्या थी उनकी नियति?

कौन सी दुनिया इंतजार कर रही थी……

इन दरवाजों के उस तरफ़……

जिन्हें मैं कभी खोल नहीं पाया……।

तभी मैंने एक अजीब सी चीज देखी……

मैंने देखा… मेरे माथे पर कुछ रेखायें बढ गई हैं…… अचानक।

अब – ये रेखायें क्या हैं।

क्या इनकी भी कोई नियति है…? अपने दरवाजे हैं?

नहीं – इनका कुछ नहीं है।

बहुत बाद में पता चला इनका कुछ भी नहीं है।

ये मौन की रेखाये हैं।

मौन – उन रेखाओं का जो मेरे हाथों में उभरी थीं।

पर मैं उनके दरवाजे कभी खोल ही नहीं पाया।


सच मैंने देखा है-

जब भी कोई रेखा मेरे हाथों से गायब हुई है…

मैंने उसका मौन अपने माथे पर महसूस किया है।

मुझे लगता है- यही मौन है – जो हमें बूढा बनाते हैं।

जिस दिन माथे पर जगह खत्म हो जायेगी……

ये मौन चेहरे पर उतर आयेगा………

और हम बूढे हो जायेंगें।


- Manav Kaul


https://youtu.be/XyO__sHlj18?si=0y9p_oRy0gajvIjp&t=196

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